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शभुनाथ रैगर : भटका हुआ नौजवान क्यों नहीं?


पिछले दिनों राजस्थान के राजसमंद में एक युवक शम्भूनाथ रैगर ने एक पश्चिम बंगाल के मजदूर की जलाकर हत्या कर दी। एक सभ्य समाज में इस तरह की हिंसक घटनाओं का कोई भी समर्थन नही कर सकता और कानून को हाथ में लेने की इजाजत तो किसी को भी नही दी जा सकती हैं। हमारी Epostmortem की टीम भी इस घटना की कड़ी निंदा करती हैं। लेकिन.. अगर इस तरह की कोई बर्बर घटना होती हैं तो इसके पीछे के कारणों पर निष्पक्ष चर्चा होनी चाहिए, निष्पक्ष जांच होनी चहिये जिसमे दोनो पक्षो की मानसिकता को समझने का प्रयास करना चाहिए ताकि इसका समाधान निकल सके और भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ती ना हो।

परन्तु मीडिया ने यह किया? नही, उसको एक वीडियो मिला जिसमे लव जिहाद का नारा लगाता हुआ एक पागल इंसान एक हत्या करता हुआ नजर आ रहा हैं उसे देखकर मीडिया शम्भूनाथ से ज्यादा पागल हो गया और बिना सच का पता लगाये, बिना मौके पर पहुँचे मीडिया के एक वर्ग ने यह साबित करने का प्रयास किया देश मे साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ रही हैं, ताकि उस समय चल रहे गुजरात चुनावो में इसका चुनावी लाभ उठाया जा सके। यहाँ तक कि रिपोर्टिंग करते वक्त इनकी पूरी कोशिश थी कि देश मे दंगे फसाद हो ताकि और बढ़िया ढंग से इनका खेल जम सके। मैं देश की जनता को धन्यवाद करना चाहूँगी की देश की जनता इन पत्रकारों के बहकावे में नही आई जिनकी मंशा देश मे दंगा-फसाद करवाने की थी।


अगर ये पत्रकार थोड़ी सी मेहनत करके शम्भूनाथ रैगर के गांव चले जाते तो इनको पता चलता कि वह मानसिक रूप से विक्षिप्त मनोरोगी हैं, जिसकी दवा चल रही हैं और यह बीमारी सिर्फ उसे ही नही उसकी बेटी को भी हैं और उसकी भी दवा चल रही हैं। पर इन्हें तो पका पकाया वीडियो मिल गया जो इनके एजेंडे को अनुरूप था और ये शुरू हो गए कि देश मे असहिष्णुता बढ़ रही हैं लव जिहाद  के नाम पर हत्याएं हो रही हैं देश का तालिबानीकरण हो रहा हैं।


चलो एकबारगी यह मानते हैं कि शम्भूनाथ रैगर मनोरोगी नही होता, तो भी हम ऊपर भी कह चुके हैं इस तरह की हर घटना की हम कड़ी निंदा करते हैं करते थे और आगे भविष्य में भी ऐसी घटनाएं स्वीकार नही करेंगे और हमेशा ऐसी घटनाओं के खिलाफ मुखर होकर लिखेंगे और बोलेंगे पर क्या ऐसा ही वादा देश की जनता के साथ ये तथाकथित पत्रकार कर पायेंगे? आइये हम आपकों बताते हैं कि ऐसी ही कुछ घटनाओं के बारे में जिसमे इन पत्रकारों को सांप सूंघ गया और उस पर एक मामूली सी रिपोर्ट लिख दी या उसे दबाने की कोशिश की ताकि एक समुदाय विशेष के हितों की रक्षा की जा सके।


1- पहला मामला हैं हिना तलरेजा की हत्या का, इलाहाबाद की रहने वाली हिना तलरेजा ने शहर के युवक अदनान खान से विवाह किया था, अदनान का परिवार इस विवाह के खिलाफ था और उन्होंने अदनान के दूसरी शादी करवा दी। जिसके विरोध में हिना ने कोर्ट से गुहार लगाई। अदनान ने हिना से बदला लेने के लिये पहले तो अपने 4 दोस्तों से उसका गैंग रेप करवाया और उसके बाद गोली मार कर हिना की हत्या कर दी, और लाश कौशाम्बी के एक हाईवे पर फेंक कर फरार हो गया, क्या इस खबर पर मीडिया ने प्राइम टाइम डिबेट की?



2- दूसरा मामला है हस्तिनापुर का, जहाँ अमीरुद्दीन नामक मुस्लिम युवक ने अपना नाम अमर बता एक दलित युवती से दोस्ती की और फिर अपने दोस्त वसीम के साथ मिलकर युवती का सिनेमा हॉल में बलात्कार कर दिया, क्या यह लव जिहाद का मामला नही था? मीडिया ने इस घटना पर क्यो चुप्पी साधी हैं क्या इसलिए कि अपराधी एक खास मजहब के हैं?

3- यह मामला भी एक दलित महिला से जुड़ा हुआ हैं, मेरठ में रहने वाली बीना गौतम को क्षेत्र का एक मुस्लिम युवक जबरन विवाह और धर्म परिवर्तन करवाना चाहता था, महिला के मना करने पर उसके घर मे जबरन घुस कर पहले उसे नॉन वेज खिलाया और विरोध करने पर सर फोड़ कर भाग गए। कहाँ है वो दलित चिंतक जो जातिसूचक शब्द मात्र बोलने पर सवर्णो पर SC ST एक्ट लगवा देते है, जय मीम जय भीम का नारा देने वाले क्या खूब दोस्ती निभा रहे है मुँह बन्द कर के?

4- चौथा मामला दिल्ली का हैं, एक 18 वर्षीय मुस्लिम युवती ने धर्म परिवर्तन कर हिन्दू यूवक से शादी की। शादी के बाद लड़की को जानकारी मिली कि उसका परिवार उस पर हमला कर सकता है, तो युवती ने हाई कोर्ट में जा कर शरण मांगी। कोर्ट की कार्यवाही के दौरान ही उसके परिवार के लोगो ने कोर्ट परिसर में उस पर हमला कर दिया पुलिस के मदद से युवती ने जैसे तैसे अपनी जान बचाई। सवाल यह हैं केरल की हादिया पर घण्टो डिबेट करने वाले इस प्रकरण पर चुप क्यो हैं?

5- यह पाँचवा मामला है बरेली के रहने वाले परवेज़ अहमद का, जिसने विनीत सक्सेना नाम से फ़र्ज़ी वोटर आईडी, पैन कार्ड और आधार कार्ड बनवा रखे थे। यह स्वयं को रेलवे में TTI बताकर युवतियो को नौकरी का झांसा दे कर लूटता था, और युवतियो को अपने जाल में फसाकर उनसे अश्लीलता करता था। पुलिस के हत्थे चढ़ने पर परवेज़ ने पूरी बात कबूल कर ली है।
अब यह देखिये, शम्भूनाथ और उसके भांजे  को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, कोर्ट उसे कल को जो भी सजा होनी है वो सुनाएगा फिर इस आन्दोलन कि क्या आवश्यकता है? ये जमावड़ा किस लिए? क्या फिर से बर्मा और फिलिस्तीन के मुसलमानो के समर्थन के नाम पर राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुचाया जाएगा और आज़ाद मैदान की तरह मीडिया चुप्पी साध लेगा?


दिक्कत यही हैं कि मीडिया ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साध लेती हैं जिसमे अपराधी किसी खास मजहब से जुड़ा होता हैं और मीडिया की इसी चुप्पी से शम्भूनाथ रैगर के समर्थन में खड़ी लोग खुद को जस्टिफाई करते नजर आते हैं वह साफ साफ भेदभाव का आरोप लगाते हैं कि मीडिया सिर्फ एक पक्ष की ही रिपोर्टिंग क्यो करती हैं? यकीन मानिए यह स्थिति बेहद विस्फोटक हैं। खुद को प्रोग्रेसिव और लिबरल बता कर घटनाओं को एकपक्षीय रिपोर्टिंग, किसी एक मजहब के अपराधियों पर चुप्पी वही दुसरे मजहब के लोगो की छोटी छोटी बातों को भी बड़ा मुद्दा बनाकर पेश करने से इन पत्रकारों ने जनता के बीच अपनी साख खो दी हैं, सोशल मीडिया पर लोग ऐसे पत्रकारों के मुंह पर ही उन्हें दलाल, दोगला, बिकाऊ तक बोलने लगे हैं यह पत्रकारिता जैसे प्रतिष्ठित पेशे के लिए बेहद शर्मनाक हैं।

खैर पत्रकारों के साथ कुछ मानवाधिकार का झंडा बुलंद किये लिबरल समाजसेवियों और नेताओं की बात नही होगी तो हमारी बात अधूरी रह जायेगी, आप याद करिये कुछ साल पहले जब मुंबई बम कांड के दुर्दांत आतंकी याकूब मेमन को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने फाँसी की सजा सुनाई थी तब इन्ही लोगो ने याकूब मेमन को भटका हुआ मासूम साबित करने के लिए देश मे कैम्पेन चलाया था, यहाँ तक कि रात 2 बजे देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा तक खुलवा लिया था और मनमुताबिक फैसला नही मिलने पर सर्वोच्च न्यायालय तक पर उंगली उठाने से बाज नही आये थे आज वही लोग शम्भूनाथ रैगर को तुरन्त फांसी पर लटकाए जाने की माँग कर रहे हैं। शम्भूनाथ रैगर के समर्थन में खड़ी भीड़ को विकृत मानसिकता की साम्प्रदायिक भीड़ बता रहे हैं पर जब आतंकी कसाब, याकूब और अफ़ज़ल के समर्थन में रात 2 बजे कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे थे तब यह उच्च विचार कहाँ चले गए थे? तब यह ख्याल क्यों नही आया कि अपराधियो आतंकियो का समर्थन देश मे एक गलत परम्परा की शुरुआत होगी और देख लीजिए जिसका डर था आखिरकार वही हुआ तब आप कसाब अफजल याकूब के समर्थन में खड़े थे और अब लोग शम्भूनाथ रैगर के पक्ष में खड़े हैं .. अब तकलीफ किस बात की हैं।

इसके साथ सरकार के भी धार्मिक तुष्टिकरण, भेदभाव और कानून के बाहर जाकर कार्य करने के तरीक़े की भी बात होना बहुत जरूरी हैं, देश का कानून कहता हैं कि 100 अपराधी बच निकले पर निर्दोष को सजा नही होनी चाहिए, और जब तक कोई न्यायालय में अपराधी साबित नही हो जाता उसे अपराधी नही माना जायेगा साथ मे यह भी कहा जाता हैं कि सजा सिर्फ अपराधी को होगी उसके परिजनों को नही.. यही बाते हमे कबीलाई कानूनों से अलग करके सभ्य समाज के लायक बनाती हैं। पर क्या इसका पालन हुआ? शम्भूनाथ ने अपराध किया था उसकी पत्नी ने नही तो फिर शम्भूनाथ की पत्नी का बैंक एकाउंट क्यो सीज किया गया? क्या याकूब अफजल की पत्नियों के भी एकाउंट इसी तरह सीज किये गए थे? अगर नही तो फिर यह डबल स्टैंडर्ड क्यो अपनाया जा रहा हैं।

अपने देश मे हर इस तरह की घटना पर लोगो को अपने हिसाब से तोड़मरोड़कर लाभ लेने की आदत हैं जिसमें पत्रकार से लेकर राजनेता तक शामिल हैं, ये लोग समाधान नही चाहते, इनका मकसद हल्ला करना हैं क्योकि अगर सूरत बदल गयी तो इनके पास मुद्दा ही खत्म हो जाएगा। वामपन्थी और लिबरल मीडिया तो इसे मौके की तरह लेती हैं, और ऐसी घटनाओं को धर्म का आधार बनाकर खेलती हैं ताकि लोग भड़के और दंगा फसाद करे और इस दंगे फसाद की आड़ में उनका अपना उल्लू सीधा हो सके। ऐसी बाते समाज में असंतोष पैदा करती हैं जो इस देश के लिए, समाज के लिए बहुत खतरनाक हैं और अभी अगर ध्यान नही दिया गया तो आगे चलकर स्थिति बेहद खराब हो सकती हैं।


यह ब्लॉग पब्लिश होने के बाद हमारी ऊपर कही बातें को साबित करता हुआ तस्लीमा नसरीन ने सनसनीखेज खुलासा किया जिसका यहाँ उल्लेख करना बेहद जरूरी हैं, पहले तस्लीमा नसरीन की ट्वीट देखे।



TRP के लिए सनसनी फैलाने तक तो ठीक है पर अब पत्रकार एक कदम और आगे बढ़कर अपने रहनुमाओं की सत्ता में वापसी करवाने के लिए देश और बहुसंख्यक समाज को बदनाम करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं।

ये चाहते क्या है ?

देश मे गृहयुद्ध छिड़ जाए, साम्प्रदायिक दंगे हो जाये ,देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाए, तब इनके दिल को ठंडक मिलेगी।

बस इसी बात को सिद्ध करने के लिए  हमने ये ब्लॉग लिखने की आवश्यकता महसूस की थी जो तस्लीमा नसरीन के  ट्वीट से सिद्ध हो रही है।

शेखर गुप्ता और तस्लीमा नसरीन की बातचीत का स्क्रीन शॉट 1

तस्लीमा नसरीन और शेखर गुप्ता की बातचीत का स्क्रीन शॉट 2

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टिप्पणियाँ

  1. ऐसी किसी भी घटना को सभ्य समाज मंजूरी नही दे सकता, और मिडिया को भी निष्पक्ष तरीके से हर घटना की रिपोर्टिंग करनी चाहिए, ताकि किसी समुदाय को यह अहसास ना हो की उसके साथ भेदभाव हो रहा है।

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  2. शेखर गुप्ता जर्नलिस्टों के उस Breed नस्ल से है, जिसका काम ही देश मे आग लगने है। याद है न वो army दिल्ली capture करने के लिए बढ़ रही है- वाला रिपोर्ट। तस्लीमा नसरीन को इस देश द्रोही और घटिया पत्रकार interview देने के पहले ही सतर्क हो जाना चाहिए था, कि ये तस्लीमा जैसी famous हस्ती के नाम पर गंदी पत्रकारिता कर सकता है, और यही उसने किया भी। अब पछताने से क्या फायदा। जितना डैमेज करना था वो तो कर चुका।

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    उत्तर
    1. बिल्कुल सही कहा सर, यही तो यह चाहते हैं कि देश मे आग लगे और यह रोटियां सेंके।

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  3. हंगर इंडेक्स मतलब 'भुखमरी सूचकांक" पर विदेशी संस्थानों की रेटिंग को लेकर भारत को कोसने वाले पत्रकार और बौद्धिक परजीवी तनिक ध्यान दें.....

    "वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम" ने भारतीय मीडिया को दुनिया के सबसे "भ्रष्ट संस्थान" करार दिया है। दुनिया के तमाम मुल्कों की मीडिया पर अध्ययन के बाद इस "काली सूची" में भारतीय मीडिया को "नंबर दो" पर रखा है और यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है भाई.??

    फोरम ने यह बात हाल के वर्षों में पत्रकारिता में आई गिरावट के सन्दर्भ में कही है, "हाल के बरस" मतलब बुझाता है ना.??

    फोरम का मानना है कि सोशल मीडिया की वजह से भारत की मुख्य धारा की मीडिया "बेनकाब" हुई है और यह साबित हो गया है कि भारतीय मीडिया अपनी साख खो चुकी है।

    अब आप सभी मित्र अपनी अपनी श्रद्धा, ईमान और सियासत के हिसाब से अपने-अपने "कोटे" के पत्रकार या मीडिया संगठन का बचाव कर लें, या फिर उन्हें गरियाँ लें.??

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    उत्तर
    1. बेहद काम की जानकारी देने के लिए धन्यवाद सर

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  4. बहुत विस्तार से सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है, धन्यवाद, ऐसे ही पोल खोल लेखन चलता रहे

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    उत्तर
    1. धन्यवाद दीपक जी, इसी तरह हौसला बढ़ाते रहिये

      हटाएं
  5. बहुत ही सुंदर तरीके से पूरे मामले को आपने अपने लेख में लिखा। आगे भी इसी तरह सही जानकारी पहुंचाते रहे।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद रमेश जी, बस आप लोग हौसला बढ़ाते रहे।

      हटाएं

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