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हिन्दू पर्व और अल्ट्रा मार्डन लिबरल ब्रिगेड



जब भी तीज त्योहरों का मौसम पास आता हैं, एक अजीब तरह के लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय  हो जाते हैं. कुछ तो शालीनता से अपनी बात रखते है, लेकिन कुछ लोग गाली गलौज पे उतर आते हैं. कुछ मज़ाक उड़ाने वाले भाव में अपना ज्ञान बांटते दिखते हैं. कुछ लानत भेजते दिखते  हैं. 

अभी  कुछ दिनों पहले करवा चौथ खत्म हुआ है. ज्ञान देने वालो की तो जैसे एक बाढ़ सी ही आ गयी. ऐसा लगा की जो लोग यह त्यौहार मनाते हैं  उनसे  गया गुजरा जीव इस धरती पर हो ही नहीं सकता. ऐसे ज़माने में, जब मनुष्य कबका चाँद पर हो कर आ गया है , आप चाँद की पूजा कर रहे हो? चाँद को देख कर व्रत तोड़ रहे हो? राम! राम! राम! शायद इस वाक्य से पहले लिखे  तीन शब्दों पर भी मुझे लताड़ा जा सकता हैं. पर क्या करें, पुरानी आदत है, आराम से नहीं जाएगी.


इन तीज त्योहारों के पास आते ही, आप को विज्ञान, पर्यावरण, प्रदुषण और इन सबसे ऊपर तर्क शास्त्र, सभी का संम्मिश्रण करके ऐसा धोबी पछाड़ दिया जाता है कि जीवन में कभी कोई व्रत नहीं रखने वाला भी लहूलुहान हो जाये. और व्रत रखने वाले अगर कोमल दिल के हों तो आत्मग्लानि से भर जाएं. 

एक मजेदार बात और है, बाकी सभी दिन यही लोग न जाने किस भांग की गोली खाते है कि इनका कभी मुँह नहीं खुलता. बाकी के दिनों में ये भी चिल करते है और आप से भी यही उम्मीद की जाती है कि आप भी चिल करें. यही इनके जीवन का मूल मंत्र है और आप का भी होना चाहिए. 

एक और आशा आप से रखी जाती है, जिंदगी को आराम से जिएं , जब तक ये हल्ला ब्रिगेड आप से कुछ नहीं मांगती. आप के सुख और आराम के लिए क्या क्या चाहिए, ये आप को यह हल्ला ब्रिगेड  समय-समय पर अपनी फिल्मों , विज्ञापनों, लेखों, फेसबुक पोस्ट  और ट्विटर पर बता देती है. चुपचाप उसको मान लीजिये. नहीं तो संघी, सांप्रदायिक, कूपमंडूक और असहिष्णु जैसे शीर्षक आप का इंतज़ार कर रहे होते हैं. 

इस हल्ला ब्रिगेड का पुराना समय बड़ा ही सुहाना था. यह जो चाहे लिखते थे, आप पढ़ कर अपने घर में बैठ कर इन पर कुलबुलाते रहिये, इनकी बला से. यह अपने आइवरी दुर्ग में बैठ कर हमको बताते रहते थे की हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत. ज्ञान के भण्डारण  का पूरा का पूरा कॉपीराइट इनके पास ही होता था.

हाँ, हम जैसे साधारण लोगों का कुलबुलाना कभी कभी यह बड़ी दरियादिली से "संपादक के नाम पत्र" में छाप देते थे. बस हमारा योगदान यही तक सीमित रह जाता था. हाँ यार दोस्तों के बीच में बैठ कर आप इस हल्ला ब्रिगेड की ऐसी की तैसी कर सकते थे. लेकिन यह स्वांत सुखाय बुदबुदाने  जैसा ही समझ लीजिये. हमारी आप की यही औकात थी. लेकिन ये नासपीटे विज्ञान पढ़ने वाले न जाने कहा से सोशल मीडिया नाम का भयानक जीव ढूढ़ लाए. इससे जो अथाह  दुःख हल्ला ब्रिगेड के जीवन में आया उस पर फिर कभी बात करेंगे. 

अभी कुछ दिन पहले ट्विटर पर एक असफल अभिनेत्री करवा चौथ पर ज्ञान दे रही थीं की पति की लम्बी उम्र धीमी गति के उपचयन और अपचयन मतलब स्लो मेटाबोलिक रेट से होती है. वैसे आमतौर पर यह मोहतरमा अपने ज्ञान को अपने तक ही सीमित रखती हैं. बाकी तीज त्योहारों पर जम के मुबारकबाद देती हैं.



लेकिन करवाचौथ, होली, दिवाली आते ही इनके अंदर का ज्ञानसागर मानो हिलोरे मारने लगता है और यह उस ज्ञान को बाटने का लोभ संवरण नहीं कर पाती है. ज्ञान छलक-छलक कर बाहर आ ही जाता है. भारतमाता के इक जिम्मेदार नागरिक वाला मोड ऑन हो जाता है. नहीं तो "एक चुप सौ सुख " के मूलमंत्र  पर चलने में इनका घोर विश्वास है.

चलिए इस हल्ला ब्रिगेड की बात हो हम शास्वत सत्य मान लेते है. करवाचौथ का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. मान लेते है कि हल्ला ब्रिगेड का कहा हर वाक्य ब्रह्म वाक्य है. तो मोहतरमा, फिर तो बड़ा संकट आ जायेगा. सबसे पहले आप की रोजी रोटी बंद हो जाएगी. कैसे? चलिए एक एक करके देखते है. 

सब लोग सभी त्योहारों को मनाना  बंद कर दे. क्योकि ज्यादेतर त्यौहार तर्क शास्त्र और विज्ञानं  की कसौटी पर खरे नहीं उतरेंगे. होली, दिवाली, ईद , क्रिसमस, हेलोवीन, नया साल, शबे बरात, नौरोज़, लोहड़ी, वैलेंटाइन डे  सब में ही संसाधनों का अपव्यय होता है, इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और इनको मानाने से कोई सुख समृद्धि या मनुष्य की आयु में वृद्धि होते नहीं देखी  गयी है. ये सब के सब त्यौहार समय और संसाधनों की बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं है. इनके मानाने के बाद आप महानता की ऊंचाइयो को छूते हैं यह बिलकुल भी तय नहीं है. शांति मिलती है? पता नहीं. प्यार बढ़ता है? कोई वैज्ञानिक आज तक यह सिद्ध नहीं कर पाया. 

सभी लोग फिल्मे देखना बंद कर दे.  इनको देखने से भी कोई सुख समृद्धि नहीं आती उलटे आप का समय और पैसा ही जाता है, और प्रोडक्ट पसंद न आने पर  न तो आप का पैसा वापस आता है न ही गया हुआ समय वापस मिलने की कोई गारंटी है. फिल्म में दिए  गए ज्ञान से आप, आप का परिवार या  आप के यार दोस्त  कुछ सीख कर लौटेंगे इसकी गारंटी कौन लेगा? है कोई तर्क या वैज्ञानिक आधार? बिजली के स्विच पे हाथ जाता है, तो पक्का पता होता है कि या तो जलती लाइट बुझ जाएगी या बुझी लाइट जल जाएगी, लेकिन एक फिल्म, एक साहित्यिक पुस्तक, एक कविता, एक गाना, एक वाद्य यंत्र से बजा संगीत, एक गायक के मुख से निकला कोई सुर, एक नर्तक या नर्तकी के पैरों से निकली झंकार , एक चित्रकार की तूलिका से संवारा गया एक चित्र, एक स्वर्णकार के हाथ से बनाया गया कोई गहना, एक शिल्पकार के हाथ से बनी कोई मूर्ति, किस गारंटी, वारंटी सुख और समृद्धि के साथ आते है? 

कौन बतायेगा की आप फलां  गाना  सुनोगे तो आप के अंदर ५० डिग्री स्केल की शांति महसूस होगी? फलना चुटकुला सुनोगे तो ४ रिचेर स्केल की हंसी आएगी कोई वैज्ञानिक आधार दो इसका ? पब में दारू पीने और डिस्को में नाचने से आप के मानसिक अवसाद का हरण हो जायेगा, दो कोई साक्ष्य इसका? नहीं दे सकते, तो सब कुछ बंद कर दिया जाये? 

तो हल्ला ब्रिगेड आप क्या कहते हो? सब कुछ बंद कर दिया जाय ? सिर्फ विज्ञान की पुस्तके ही पढ़ी और पढ़ायी जाएँ? वैसे तो विज्ञान भी, विज्ञान होने से पहले, कल्पना, परम्परा और सबसे बढ़कर विश्वास  ही हुआ करता है. इस पर क्या ख्याल है हल्ला ब्रिगेड? थोड़ा ज्ञान वर्धन करिये। हम साधारण मनुष्यों के लिए बड़ी दिशाहीनता की स्थिति आ गयी हैं।

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