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चित्तौड़ गढ़ : रानी पद्मावती का जौहर


राजस्थान का चित्तौड़गढ़ राजपूतो की बहादुरी स्वाभिमान बलिदान का जीता जागता स्मारक हैं, इस किले के इतिहास में राजपूतों के शौर्य की अनगिनत लोमहर्षक बलिदानों की कहानियां दर्ज हैं, लेकिन चित्तौड़गढ़ सिर्फ राजपूतों की बहादुरी के लिए ही नही, बल्कि इसे रानी पद्मावती की वजह से भी जाना जाता हैं। चित्तौड़गढ़ का किला सम्मान के लिए जौहर करने वाली रानी पद्मावती की वीरता का भी गवाह हैं।

रानी पद्मावती के पिता सिंघल प्रांत (श्रीलंका) के राजा थे। उनका नाम गंधर्वसेन था। और उनकी माता का नाम चंपावती था। पद्मावती बाल्य काल से ही दिखने में अत्यंत सुंदर और आकर्षक थीं। कहा जाता है बचपन में पद्मावती के पास एक बोलता तोता था जिसका नाम हीरामणि रखा गया था।

रानी पद्मावती का स्वयंवर

पद्मिनी जब युवा हुई तो उनके पिता महाराज गंधर्वसेन नें अपनी पुत्री पद्मावती के विवाह के लिए उनका स्वयंवर रचाया था जिस में भाग लेने के लिए भारत के अगल अलग हिन्दू राज्यों के राजा-महाराजा आए थे। गंधर्वसेन के राज दरबार में लगी राजा-महाराजाओं की भीड़ में एक छोटे से राज्य का पराक्रमी राजा मल्खान सिंह भी आया था। उसी स्वयंवर में विवाहित राजा रावल रत्न सिंह भी मौजूद थे। उन्होनें मल्खान सिंह को स्वयंवर में परास्त कर के रानी पद्मिनी पर अपना अधिकार सिद्ध किया और उनसे धाम-धूम से विवाह रचा लिया।

चित्तौड़गढ़

सन 12वीं – 13 वीं शताब्दी में राजपूत राजा ‘रावल रतन सिंह’ का राज चित्तोड़ में था। वो सिसोदिया राजवंश के थे और रानी पद्मिनी से विवाह के पूर्व उनकी पहले से ही 13 पत्नियां थी। रावल रतन सिंह एक पराक्रमी योद्धा थे और विवाह के बाद रानी पद्मावती से बहुत प्रेम करने लगे इसलिए उसके बाद उन्होंने कभी भी विवाह नहीं किया। वो बहुत ही अच्छे और साहसी थे और उन्होंने हमेशा अपने राज्य के लोगों से प्यार किया और उनका ख्याल रखा।

राजा रावल रत्न सिंह रण कौशल और राजनीति में निपुण थे। उनका भव्य दरबार एक से बढ़कर एक महावीर योद्धाओं से भरा हुआ था। चित्तौड़ की सैन्य शक्ति और युद्ध कला दूर-दूर तक मशहूर थी। उनकी सभा में बहुत सारे बुद्धिमान व्यक्ति और अच्छे कलाकार थे। वे कला का सम्मान करते थे और अच्छे कलाकारों को पुरस्कृत भी करते थे।

उनका एक संगीतकार था जिसका नाम था ‘राघव चेतन’। सभी लोग, प्रजा यह बात तो जानते थे कि वह एक अच्छा संगीतकार था पर कोई भी नहीं जानता था की वह जादू मन्त्र भी जानता था और अपने प्रतिद्वंद्वियों को हारने के लिए जादू और तंत्र विद्या का उपयोग करता था, पर एक दिन गलती से वह जादू करते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया यह बात राजा रावल रतन सिंह को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने उसे गधे पर बैठा कर सारा राज्य घुमाने का आदेश दिया। इसकी वजह से वह प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ राज्य छोड़ कर चला गया।

चित्तौड़ से भागने के बाद राघव चेतन दिल्ली के सुलतान, अलाउद्दीन खिलजी के पास पहुँचा, अलाउदीन खिलजी एक क्रूर और चरित्रहीन शासक था। उसने अपने चाचा जलालुदीन की हत्या करके दिल्ली का साम्राज्य प्राप्त किया था। अलाउदीन सुंदर स्त्रियों का दीवाना था। खिलजी की इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए राघव चेतन ने खिलजी को भड़काया और रानी पद्मिनी के सौन्दर्य का बखान करके चित्तोड़ पर आक्रमण करने के लिए उकसाया। राघव चेतन ने चित्तौड़ राज्य की सैन्य शक्ति, चित्तौड़ गढ़ की सुरक्षा और वहाँ की सम्पदा से जुड़ा एक-एक राज़ बताता हैं और राजा रावल रत्न सिंह की धर्म पत्नी रानी पद्मावती के अद्भुत सौन्दर्य का बखान भी कर देता है। यह सब बातें जान कर अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण कर के वहाँ की सम्पदा लूटने, वहाँ कब्ज़ा करने और परम तेजस्वी रूपवती रानी पद्मावती को हासिल करने का मन बना लेता है।

राघव चेतन की बातें सुन कर अलाउद्दीन खिलजी नें कुछ ही दिनों में चित्तौड़ राज्य पर आक्रमण करने का मन बना लिया और अपनी एक विशाल सेना चित्तौड़ राज्य की और रवाना कर दी। अलाउद्दीन खिलजी की सेना चित्तौड़ तक पहुँच तो गयी पर चित्तौड़ के किले की अभेद्य सुरक्षा देख कर अलाउद्दीन खिलजी की पूरी सेना स्तब्ध हो गयी। उन्होने वहीं किले के आस पास अपने पड़ाव डाल लिए और चित्तौड़ राज्य के किले की सुरक्षा भेदने का उपाय ढूँढने लगे।

अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को भेजा कपट संदेश

जब से राजा रावल रत्न सिंह नें रूप सुंदरी रानी पद्मावती को स्वयंवर में जीता था तभी से पद्मावती अपनी सुंदरता के लिये दूर-दूर तक चर्चा का विषय बनी हुई थी। इस बात का फायदा उठाते हुए कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें चित्तौड़ किले के अंदर राजा रावल रत्न सिंह के पास एक संदेश भिजवाया कि वह रानी पद्मावती की सुंदरता का बखान सुन कर उनके दीदार के लिये दिल्ली से यहाँ तक आये हैं और अब एक बार रूप सुंदरी रानी पद्मावती को दूर से देखने का अवसर चाहते हैं।

अलाउद्दीन खिलजी नें यहाँ तक कहा की वह रानी पद्मावती को अपनी बहन समान मानते हैं और वह सिर्फ उसे दूर से एक नज़र देखने की ही तमन्ना रखते हैं।

चित्तौड़ के महाराज रावल रत्न सिंह का अलाउद्दीन खिलजी को जवाब

अलाउद्दीन खिलजी की इस अजीब मांग को राजपूत मर्यादा के विरुद्ध बता कर राजा रावल रत्न सिंह नें ठुकरा दिया। पर फिर भी अलाउद्दीन खिलजी नें रानी पद्मावती को बहन समान बताया था इसलिये उस समय एक रास्ता निकाला गया। पर्दे के पीछे रानी पद्मावती सीढ़ियों के पास से गुज़रेंगी और सामने एक विशाल काय शीशा रखा जाएगा जिसमें रानी पद्मावती का प्रतिबिंम अलाउद्दीन खिलजी देख सकते हैं। इस तरह राजपूतना मर्यादा भी भंग ना होगी और अलाउद्दीन खिलजी की बात भी रह जायेगी।

अलाउद्दीन खिलजी नें दिया धोखा

शर्त अनुसार चित्तौड़ के महाराज ने अलाउद्दीन खिलजी को आईने में रानी पद्मावती का प्रतिबिंब दिखला दिया और फिर अलाउद्दीन खिलजी को खिला-पिला कर पूरी महेमान नवाज़ी के साथ चित्तौड़ किले के सातों दरवाज़े पार करा कर उनकी सेना के पास छोड़ने खुद गये। इसी अवसर का लाभ ले कर कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को बंदी बना लिया और किले के बाहर अपनी छावनी में कैद कर दिया।

 इसके बाद संदेश भिजवा दिया गया कि –

अगर महाराज रावल रत्न सिंह को जीवित देखना है तो रानी पद्मावती को फौरन अलाउद्दीन खिलजी की खिदमद में किले के बाहर भेज दिया जाये।

रानी पद्मावती, चौहान राजपूत सेनापति गौरा और बादल की युक्ति

चित्तौड़ राज्य के महाराज को अलाउद्दीन खिलजी की गिरफ्त से सकुशल मुक्त कराने के लिये रानी पद्मावती, गौरा और बादल नें मिल कर एक योजना बनाई। इस योजना के तहत किले के बाहर मौजूद अलाउद्दीन खिलजी तक यह पैगाम भेजना था की रानी पद्मावती समर्पण करने के लिये तैयार है और पालकी में बैठ कर किले के बाहर आने को राज़ी है। और फिर पालकी में रानी पद्मावती और उनकी सैकड़ों दासीयों की जगह नारी भेष में लड़ाके योद्धा भेज कर बाहर मौजूद दिल्ली की सेना पर आक्रमण कर दिया जाए और इसी अफरातफरी में राजा रावल रत्न सिंह को अलाउद्दीन खिलजी की कैद से मुक्त करा लिया जाये।

रानी पद्मावती के इंतज़ार में बावरा हुआ अलाउद्दीन खिलजी

कहा जाता है की वासना और लालच इन्सान की बुद्धि हर लेती है। अलाउद्दीन खिलजी के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब चित्तौड़ किले के दरवाज़े एक के बाद एक खुले तब अंदर से एक की जगह सैकड़ों पालकियाँ बाहर आने लगी। जब यह पूछा गया की इतनी सारी पालकियाँ क्यूँ साथ हैं तब अलाउद्दीन खिलजी को यह उत्तर दिया गया की यह सब रानी पद्मावती की खास दासीयों का काफिला है जो हमेशा उनके साथ जाता है।

अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मावती पर इतना मोहित था की उसने इस बात की पड़ताल करना भी ज़रूरी नहीं समझा की सभी पालकियों को रुकवा कर यह देखे कि उनमें वाकई में दासियाँ ही है। और इस तरह चित्तौड़ का एक पूरा लड़ाकू दस्ता नारी भेष में किले के बाहर आ पहुंचा। कुछ ही देर में अलाउद्दीन खिलजी नें रानी पद्मावती की पालकी अलग करवा दी और परदा हटा कर उनका दीदार करना चाहा। तो उसमें से राजपूत सेनापति गौरा निकले और उन्होने आक्रमण कर दिया। उसी वक्त चित्तौड़ सिपाहीयों नें भी हमला कर दिया और वहाँ मची अफरातफरी में बादल नें राजा रावल रत्न सिंह को बंधन मुक्त करा लिया और उन्हे अलाउद्दीन खिलजी के अस्तबल से चुराये हुए घोड़े पर बैठा कर सुरक्षित चित्तौड़ किले के अंदर पहुंचा दिया। इस लड़ाई मे राजपूत सेनापति गौरा और पालकी के संग बाहर आये सभी योद्धा शहीद हो गये।

अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण

अपनी युक्ति नाकाम हो जाने की वजह से बादशाह अलाउद्दीन खिलजी झल्ला उठा उसनें उसी वक्त चित्तौड़ किले पर आक्रमण कर दिया पर वे  उस अभेद्य किले  में दाखिल नहीं हो सके। तब उन्होने किले में खाद्य और अन्य ज़रूरी चीजों के खत्म होने तक इंतज़ार करने का फैसला लिया। कुछ दिनों में किले के अंदर खाद्य आपूर्ति समाप्त हो गयी और वहाँ के निवासी किले की सुरक्षा से बाहर आ कर लड़ मरने को मजबूर हो गये। अंत में रावल रत्न सिंह नें द्वार खोल कर आर- पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया और किले के दरवाज़े खोल दिये। किले की घेराबंदी कर के राह देख रहे मौका परस्त अलाउद्दीन खिलजी ने और उसकी सेना नें दरवाज़ा खुलते ही तुरंत आक्रमण कर दिया।

इस भीषण युद्ध में पराक्रमी राजा रावल रत्न सिंह वीर गति हो प्राप्त हुए और उनकी पूरी सेना भी हार गयी। अलाउद्दीन खिलजी नें एक-एक कर के सभी राजपूत योद्धाओं को मार दिया और किले के अंदर घुसने की तैयारी कर ली।

चित्तौड़ की महारानी पद्मावती और नगर की सभी महिलाओं नें लिया जौहर करने का फैसला

युद्ध में राजा रावल रत्न सिंह के मारे जाने और चित्तौड़ सेना के समाप्त हो जाने की सूचना पाने के बाद रानी पद्मावती जान चुकी थी कि अब अलाउद्दीन खिलजी की सेना किले में दाखिल होते ही चित्तौड़ के आम नागरिक पुरुषों और बच्चों को मौत के घाट उतार देगी और औरतों को गुलाम बना कर उन पर अत्याचार करेगी। इसलिये राजपूतना रीति अनुसार वहाँ की सभी महिलाओं नें जौहर करने का फैसला लिया।

जौहर की रीति निभाने के लिए  नगर के बीच एक बड़ा सा अग्नि कुंड बनाया गया और रानी पद्मावती और अन्य महिलाओं ने एक के बाद एक महिलायेँ उस धधकती चिता में कूद कर अपने प्राणों की बलि दे दी।

इतिहास में राजा रावल रत्न सिंह, रानी और पद्मावती, सेना पति गौरा और बादल का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है और चित्तौड़ की सेना वहाँ के आम नागरिक भी सम्मान के साथ याद किये जाते हैं जिनहोने अपनी जन्म भूमि की रक्षा के खातिर अपने प्राणों का बलिदान दिया।

यह वही कुंड में जिसमे रानी पद्मावती ने सम्मान की रक्षा करते हुए जौहर किया था।

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लेखिका ~ अवंतिका सिंह




टिप्पणियाँ

  1. ह्रदय को झकझोर कर दिया।रोम-रोम जाग उठा।☺

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  2. इसी कहानी को श्याम नारायण पांडेय ने जौहर नामक काव्य में वर्णन किया है।वीरो की वीरता और पद्मिनी की जौहर की कथा सदियों तक हिन्दू जनमानस को उत्प्रेरित करता रहेगा।

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  3. विस्तार से बारीकी के साथ वर्णन किया है, हिन्दू गौरवशाली इतिहास सभी को अवश्य जानना चाहिये।

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